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mahabharat 6.33.30: यदि कोई घोर से घोर कर्म भी करता है, फिर भी यदि वह भक्ति में लीन रहता है, तो उसे संत मानना ​​चाहिए, क्योंकि वह अपने संकल्प पर अडिग रहता है।   |   mahabharat अध्याय 6.33: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 9: परम गुह्य ज्ञान   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.33.30 
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स: ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई घोर से घोर कर्म भी करता है, फिर भी यदि वह भक्ति में लीन रहता है, तो उसे संत मानना ​​चाहिए, क्योंकि वह अपने संकल्प पर अडिग रहता है।
 
If someone commits the most heinous deeds, but if he remains devoted to devotion, then he should be considered a saint because he remains firm in his resolve.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)