श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 33: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 9: परम गुह्य ज्ञान  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  6.33.29 
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय: ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्य‍ा मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
मैं न तो किसी से द्वेष करता हूँ, न किसी के प्रति पक्षपात करता हूँ। मैं सबके प्रति सम हूँ। परन्तु जो कोई भक्तिपूर्वक मेरी सेवा करता है, वह मेरा मित्र है, मुझमें स्थित रहता है और मैं भी उसका मित्र हूँ।
 
I neither hate anyone nor am I partial towards anyone. I am equal to all. But whoever serves me with devotion is my friend, remains in me and I am also his friend.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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