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mahabharat 6.32.22: भगवान्, जो सबसे महान हैं, केवल अनन्य भक्ति से ही प्राप्त किए जा सकते हैं। यद्यपि वे अपने धाम में निवास करते हैं, फिर भी वे सर्वव्यापी हैं और सब कुछ उनमें स्थित है।   |   mahabharat अध्याय 6.32: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 8: भगवत्प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.32.22 
पुरुष: स पर: पार्थ भक्त्य‍ा लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्त:स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान्, जो सबसे महान हैं, केवल अनन्य भक्ति से ही प्राप्त किए जा सकते हैं। यद्यपि वे अपने धाम में निवास करते हैं, फिर भी वे सर्वव्यापी हैं और सब कुछ उनमें स्थित है।
 
The Lord, who is the greatest, can be attained only by exclusive devotion. Although He resides in His own abode, He is omnipresent and everything is situated in Him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)