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अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहु: परमां गतिम् ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ २१ ॥
अनुवाद
जिसे वेदान्ती लोग अव्यक्त और अविनाशी कहते हैं, जो परम गति है, जिसे पाकर कोई लौटकर नहीं आता, वही मेरा परम धाम है।
That which the Vedantins describe as unmanifest and indestructible, which is the ultimate destination, after attaining which no one returns, that is my supreme abode.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥