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mahabharat 6.32.16: इस संसार में, ऊँचे से लेकर नीचे तक, सभी लोक दुःखों के धाम हैं, जहाँ जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है। परन्तु हे कुन्तीपुत्र! जो मेरे धाम को प्राप्त हो जाता है, उसका फिर कभी जन्म नहीं होता।   |   mahabharat अध्याय 6.32: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 8: भगवत्प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 32: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 8: भगवत्प्राप्ति  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  6.32.16 
आब्रह्मभुवनाल्ल‍ोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में, ऊँचे से लेकर नीचे तक, सभी लोक दुःखों के धाम हैं, जहाँ जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है। परन्तु हे कुन्तीपुत्र! जो मेरे धाम को प्राप्त हो जाता है, उसका फिर कभी जन्म नहीं होता।
 
In this world, from the highest to the lowest, all the worlds are abodes of sorrows, where the cycle of birth and death continues. But O son of Kunti! One who attains my abode never takes birth again.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)