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mahabharat 6.32.14: हे अर्जुन! जो अनन्य भक्ति से निरन्तर मेरा स्मरण करता है, उसके लिए मैं सहज ही सुलभ हूँ, क्योंकि वह मुझमें ही समर्पित रहता है।   |   mahabharat अध्याय 6.32: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 8: भगवत्प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 32: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 8: भगवत्प्राप्ति  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  6.32.14 
अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश: ।
तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन: ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
हे अर्जुन! जो अनन्य भक्ति से निरन्तर मेरा स्मरण करता है, उसके लिए मैं सहज ही सुलभ हूँ, क्योंकि वह मुझमें ही समर्पित रहता है।
 
O Arjuna, I am easily accessible to the one who constantly remembers me with exclusive devotion, because he remains devoted to me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)