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mahabharat 6.3.82-83: युद्ध महापापों का भण्डार है। इन बुराइयों में सबसे बड़ी बुराई नरसंहार है। यदि पचास सैनिक भी हों जो एक-दूसरे को जानते हों, आनंद और उत्साह से भरे हों, किसी भी चीज़ से आसक्त न हों, विजय के लिए दृढ़ निश्चयी हों और वीरता से भरे हों, तो वे एक बहुत बड़ी सेना को परास्त कर सकते हैं। यदि पाँच, छह या सात योद्धा भी हों जो पीछे न हटें, तो वे भी निश्चित रूप से विजयी हैं। 82-83   |   mahabharat अध्याय 6.3: व्यासजीके द्वारा अमंगलसूचक उत्पातों तथा विजयसूचक लक्षणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 3: व्यासजीके द्वारा अमंगलसूचक उत्पातों तथा विजयसूचक लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 82-83
 
 
श्लोक  6.3.82-83 
महादोष: संनिपातस्तस्याद्य: क्षय उच्यते।
परस्परज्ञा: संहृष्टा व्यवधूता: सुनिश्चिता:॥ ८२॥
पञ्चाशदपि ये शूरा मृद्‍गन्ति महतीं चमूम्।
अपि वा पञ्च षट् सप्त विजयन्त्यनिवर्तिन:॥ ८३॥
 
 
अनुवाद
युद्ध महापापों का भण्डार है। इन बुराइयों में सबसे बड़ी बुराई नरसंहार है। यदि पचास सैनिक भी हों जो एक-दूसरे को जानते हों, आनंद और उत्साह से भरे हों, किसी भी चीज़ से आसक्त न हों, विजय के लिए दृढ़ निश्चयी हों और वीरता से भरे हों, तो वे एक बहुत बड़ी सेना को परास्त कर सकते हैं। यदि पाँच, छह या सात योद्धा भी हों जो पीछे न हटें, तो वे भी निश्चित रूप से विजयी हैं। 82-83
 
War is a storehouse of great evils. The chief of these evils is genocide. If there are even fifty soldiers who know each other, are full of joy and enthusiasm, are not attached to anything and have a firm resolve to win and are full of bravery, then they can rout a very large army. If there are only five, six or seven warriors who do not retreat, then they too are certainly victorious. 82-83.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)