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mahabharat 6.3.61: आपका प्रभाव अतुलनीय है। आप हमारे आश्रयदाता, मार्गदर्शक और धैर्यवान पुरुष हैं। मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। महर्षि! मेरी बुद्धि भी पापकर्म करने को नहीं चाहती; परन्तु मैं क्या करूँ? मेरे पुत्र मेरे वश में नहीं हैं ॥61॥   |   mahabharat अध्याय 6.3: व्यासजीके द्वारा अमंगलसूचक उत्पातों तथा विजयसूचक लक्षणोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 3: व्यासजीके द्वारा अमंगलसूचक उत्पातों तथा विजयसूचक लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  6.3.61 
प्रसादये त्वामतुलप्रभावं
त्वं नो गतिर्दर्शयिता च धीर:।
न चापि ते मद्वशगा महर्षे
न चाधर्मं कर्तुमर्हा हि मे मति:॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
आपका प्रभाव अतुलनीय है। आप हमारे आश्रयदाता, मार्गदर्शक और धैर्यवान पुरुष हैं। मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। महर्षि! मेरी बुद्धि भी पापकर्म करने को नहीं चाहती; परन्तु मैं क्या करूँ? मेरे पुत्र मेरे वश में नहीं हैं ॥61॥
 
Your influence is incomparable. You are our shelter, guide and a patient man. I want to please you. Maharshi! Even my intellect does not want to commit sinful actions; but what can I do? My sons are not in my control. ॥ 61॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)