Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 6.29.8-9: दिव्य चेतना वाला व्यक्ति देखते, सुनते, स्पर्श करते, सूंघते, खाते, चलते, सोते और सांस लेते समय अपने हृदय में सदैव यह जानता रहता है कि वह वास्तव में कुछ भी नहीं कर रहा है। बोलते, त्याग करते, ग्रहण करते, आँखें खोलते या बंद करते समय वह यह जानता है कि भौतिक इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में व्यस्त हैं और वह इन सबसे पृथक है। | mahabharat अध्याय 6.29: श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5: कर्मयोग । mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ॥ ८ ॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९ ॥
अनुवाद
दिव्य चेतना वाला व्यक्ति देखते, सुनते, स्पर्श करते, सूंघते, खाते, चलते, सोते और सांस लेते समय अपने हृदय में सदैव यह जानता रहता है कि वह वास्तव में कुछ भी नहीं कर रहा है। बोलते, त्याग करते, ग्रहण करते, आँखें खोलते या बंद करते समय वह यह जानता है कि भौतिक इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में व्यस्त हैं और वह इन सबसे पृथक है।
A man of divine consciousness, while seeing, hearing, touching, smelling, eating, walking, sleeping and breathing, is always aware in his heart that he is actually doing nothing. While speaking, giving up, receiving or opening or closing his eyes, he is aware that the material senses are engaged in their respective objects and that he is separate from all these.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥