श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 29: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 5: कर्मयोग  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  6.29.3 
ज्ञेय: स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्‍क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
जो पुरुष न तो कर्मफल से द्वेष करता है और न ही कर्मफल की इच्छा करता है, वही स्थायी त्यागी कहलाता है। हे महाबाहु अर्जुन! ऐसा पुरुष समस्त द्वन्द्वों से मुक्त होकर जीवन-बन्धन को पार कर पूर्णतः मुक्त हो जाता है।
 
A man who neither hates the results of his actions nor desires the results of his actions is known as a permanent renunciant. Oh mighty-armed Arjuna! Such a man becomes free from all conflicts and crosses the bondage of life and becomes completely liberated.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)