Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 6.29.27-28: समस्त इन्द्रिय-विषयों का परित्याग करके, भौहों के मध्य दृष्टि को एकाग्र करके, प्राण और अपान वायु को नासिका में रोककर तथा इस प्रकार मन, इन्द्रिय और बुद्धि को वश में करके मोक्ष प्राप्ति का लक्ष्य रखने वाला योगी इच्छा, भय और क्रोध से मुक्त हो जाता है। जो निरन्तर इस अवस्था में स्थित रहता है, वह अवश्य ही मुक्त हो जाता है।   |   mahabharat अध्याय 6.29: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 5: कर्मयोग   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 29: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 5: कर्मयोग  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  6.29.27-28 
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवो: ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ २७ ॥
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायण: ।
विगतेच्छाभयक्रोधो य: सदा मुक्त एव स: ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
समस्त इन्द्रिय-विषयों का परित्याग करके, भौहों के मध्य दृष्टि को एकाग्र करके, प्राण और अपान वायु को नासिका में रोककर तथा इस प्रकार मन, इन्द्रिय और बुद्धि को वश में करके मोक्ष प्राप्ति का लक्ष्य रखने वाला योगी इच्छा, भय और क्रोध से मुक्त हो जाता है। जो निरन्तर इस अवस्था में स्थित रहता है, वह अवश्य ही मुक्त हो जाता है।
 
By excluding all sense-objects, by concentrating the gaze between the eyebrows, by stopping the prana and apana vayu within the nostrils, and by thus controlling the mind, senses and intellect, the yogi who aims at liberation becomes free from desire, fear and anger. He who constantly remains in this state is certainly liberated.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)