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mahabharat 6.29.23: यदि मनुष्य इस शरीर को छोड़ने से पहले इंद्रियों के आवेगों को सहन करने तथा इच्छा और क्रोध के आवेगों को नियंत्रित करने में सक्षम है, तो वह इस संसार में सुखी रह सकता है।   |   mahabharat अध्याय 6.29: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 5: कर्मयोग   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 29: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 5: कर्मयोग  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  6.29.23 
शक्न‍ोतीहैव य: सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भ‍वं वेगं स युक्त: स सुखी नर: ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
यदि मनुष्य इस शरीर को छोड़ने से पहले इंद्रियों के आवेगों को सहन करने तथा इच्छा और क्रोध के आवेगों को नियंत्रित करने में सक्षम है, तो वह इस संसार में सुखी रह सकता है।
 
If a man is able to tolerate the impulses of the senses and to restrain the impulses of desire and anger before leaving this body, he can remain happy in this world.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)