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mahabharat 6.29.17: जब मनुष्य की बुद्धि, मन, श्रद्धा और शरण सब भगवान में स्थिर हो जाते हैं, तभी वह पूर्ण ज्ञान के द्वारा समस्त अशुद्धियों से शुद्ध होकर मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होता है।   |   mahabharat अध्याय 6.29: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 5: कर्मयोग   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 29: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 5: कर्मयोग  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  6.29.17 
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणा: ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषा: ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
जब मनुष्य की बुद्धि, मन, श्रद्धा और शरण सब भगवान में स्थिर हो जाते हैं, तभी वह पूर्ण ज्ञान के द्वारा समस्त अशुद्धियों से शुद्ध होकर मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होता है।
 
When a man's intellect, mind, faith and refuge are all fixed in God, only then he becomes purified of all impurities through perfect knowledge and progresses on the path of liberation.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)