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mahabharat 6.28.35: एक बार जब तुम्हें आत्मज्ञानी पुरुष से वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो जाएगा, तो तुम फिर कभी ऐसी आसक्ति के अधीन नहीं रहोगे, क्योंकि इस ज्ञान के माध्यम से तुम यह देख पाओगे कि सभी जीव परमात्मा के अंश हैं, अर्थात् वे सभी मेरे हैं।   |   mahabharat अध्याय 6.28: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 4: दिव्य ज्ञान   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.28.35 
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषाणि द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
एक बार जब तुम्हें आत्मज्ञानी पुरुष से वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो जाएगा, तो तुम फिर कभी ऐसी आसक्ति के अधीन नहीं रहोगे, क्योंकि इस ज्ञान के माध्यम से तुम यह देख पाओगे कि सभी जीव परमात्मा के अंश हैं, अर्थात् वे सभी मेरे हैं।
 
Once you have received the real knowledge from the self-realized person, you will never again be subject to such attachment, because through this knowledge you will be able to see that all living entities are parts and parcels of the Supreme Soul, that is, they all belong to me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)