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mahabharat 6.28.30: जो लोग इन यज्ञों को करते हैं, वे सभी यज्ञों का अर्थ जानकर पापों से मुक्त हो जाते हैं और यज्ञों के फल रूपी अमृत का स्वाद लेकर परम दिव्य आकाश की ओर बढ़ते हैं।   |   mahabharat अध्याय 6.28: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 4: दिव्य ज्ञान   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.28.30 
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ।
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
जो लोग इन यज्ञों को करते हैं, वे सभी यज्ञों का अर्थ जानकर पापों से मुक्त हो जाते हैं और यज्ञों के फल रूपी अमृत का स्वाद लेकर परम दिव्य आकाश की ओर बढ़ते हैं।
 
All those who perform these yagyas become free from sins by knowing the meaning of yagyas and by tasting the nectar of the fruit of yagyas, they move towards the ultimate divine sky.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)