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mahabharat 6.28.27: दूसरा, जो लोग अपने मन और इन्द्रियों को वश में करना चाहते हैं और आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करना चाहते हैं, वे अपनी समस्त इन्द्रियों और प्राणों के कार्यों को नियंत्रित मन की अग्नि में अर्पित कर देते हैं।   |   mahabharat अध्याय 6.28: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 4: दिव्य ज्ञान   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.28.27 
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
आत्मसंयमयोगाग्न‍ौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
दूसरा, जो लोग अपने मन और इन्द्रियों को वश में करना चाहते हैं और आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करना चाहते हैं, वे अपनी समस्त इन्द्रियों और प्राणों के कार्यों को नियंत्रित मन की अग्नि में अर्पित कर देते हैं।
 
Second, those who want to control their mind and senses and attain Self-realisation, offer the functions of all their senses and the vital breath to the fire of a controlled mind.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)