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श्लोक  6.28.20 
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
वह अपने कर्मों के फल की आसक्ति त्यागकर, सदैव संतुष्ट और स्वतंत्र रहकर, सभी प्रकार के कार्यों में व्यस्त रहते हुए भी कोई स्वार्थपूर्ण कर्म नहीं करता।
 
Having given up all attachment to the results of his actions, remaining ever satisfied and independent, he does not perform any selfish action even while being busy in all kinds of work.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)