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mahabharat 6.28.18: जो मनुष्य कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह सभी मनुष्यों में सबसे बुद्धिमान है और सभी प्रकार के कर्मों में संलग्न रहते हुए भी दिव्य अवस्था में रहता है।   |   mahabharat अध्याय 6.28: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 4: दिव्य ज्ञान   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.28.18 
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह सभी मनुष्यों में सबसे बुद्धिमान है और सभी प्रकार के कर्मों में संलग्न रहते हुए भी दिव्य अवस्था में रहता है।
 
The man who sees inaction in action and action in inaction is the wisest of all men and remains in a divine state even while engaged in all kinds of actions.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)