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श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 27: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 3: कर्मयोग  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  6.27.5 
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति से प्राप्त गुणों के अनुसार कर्म करने के लिए विवश होता है; अतः कोई भी व्यक्ति एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता।
 
Every person is forced to act according to the qualities acquired from nature; hence no one can remain without action even for a moment.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)