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श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 27: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 3: कर्मयोग  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  6.27.4 
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्य पुरुषोऽश्न‍ुते ।
न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
न तो कर्म से विमुख होकर उसके फल से मुक्ति मिल सकती है, न ही केवल त्याग से सफलता प्राप्त हो सकती है।
 
Neither can one be freed from the consequences of karma by turning away from it, nor can one achieve success by mere renunciation.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)