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यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ १७ ॥
अनुवाद
लेकिन जो व्यक्ति आत्मा में आनन्द पाता है और जिसका जीवन आत्म-साक्षात्कार से परिपूर्ण है तथा जो अपने भीतर पूर्णतः संतुष्ट है, उसके लिए कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है।
But for a person who finds joy in the Self and whose life is full of Self-realisation and who is completely satisfied within himself, there is nothing to be done.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥