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mahabharat 6.27.17: लेकिन जो व्यक्ति आत्मा में आनन्द पाता है और जिसका जीवन आत्म-साक्षात्कार से परिपूर्ण है तथा जो अपने भीतर पूर्णतः संतुष्ट है, उसके लिए कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है।   |   mahabharat अध्याय 6.27: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 3: कर्मयोग   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 27: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 3: कर्मयोग  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  6.27.17 
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्त‍श्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
लेकिन जो व्यक्ति आत्मा में आनन्द पाता है और जिसका जीवन आत्म-साक्षात्कार से परिपूर्ण है तथा जो अपने भीतर पूर्णतः संतुष्ट है, उसके लिए कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है।
 
But for a person who finds joy in the Self and whose life is full of Self-realisation and who is completely satisfied within himself, there is nothing to be done.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)