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श्लोक 6.26.72  |
एषा ब्राह्मी स्थितिःपार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥ |
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| अनुवाद |
| यही आध्यात्मिक एवं दिव्य जीवन का मार्ग है, जिसे प्राप्त करने के बाद मनुष्य मोहग्रस्त नहीं होता। यदि जीवन के अंतिम क्षण में भी मनुष्य इसी प्रकार स्थित रहे, तो वह ईश्वर के धाम में प्रवेश कर सकता है। |
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| This is the path of spiritual and divine life, after attaining which man is not deluded. If one is situated in this way even at the last moment of life, then he can enter the abode of God. |
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इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्याय:॥ २॥ भीष्मपर्वणि तु षड्विंशोऽध्याय:॥ २६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्गीतापर्वके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्, श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें सांख्ययोग नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ॥ २॥ भीष्मपर्वमें छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६॥
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