Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 6.26.70: केवल वही व्यक्ति शांति प्राप्त कर सकता है जो सागर में बहने वाली नदियों की तरह इच्छाओं के निरंतर प्रवाह से विचलित नहीं होता है, तथा जो सदैव शांत रहता है, न कि वह जो ऐसी इच्छाओं को संतुष्ट करने का प्रयास करता है। | mahabharat अध्याय 6.26: श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2: गीता का सार । mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ ७० ॥
अनुवाद
केवल वही व्यक्ति शांति प्राप्त कर सकता है जो सागर में बहने वाली नदियों की तरह इच्छाओं के निरंतर प्रवाह से विचलित नहीं होता है, तथा जो सदैव शांत रहता है, न कि वह जो ऐसी इच्छाओं को संतुष्ट करने का प्रयास करता है।
Only he who is not disturbed by the incessant flow of desires, like rivers flowing into the ocean, and who remains ever calm, can attain peace, not he who tries to satisfy such desires.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥