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mahabharat 6.26.64: परन्तु जो व्यक्ति समस्त राग-द्वेष से मुक्त है तथा आत्म-संयम द्वारा अपनी इन्द्रियों को वश में करने में समर्थ है, वह भगवान की पूर्ण कृपा प्राप्त कर सकता है।   |   mahabharat अध्याय 6.26: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 2: गीता का सार   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 26: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 2: गीता का सार  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  6.26.64 
रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयनिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ ६४ ॥
 
 
अनुवाद
परन्तु जो व्यक्ति समस्त राग-द्वेष से मुक्त है तथा आत्म-संयम द्वारा अपनी इन्द्रियों को वश में करने में समर्थ है, वह भगवान की पूर्ण कृपा प्राप्त कर सकता है।
 
But a person who is free from all passion and hatred and is able to control his senses through self-control can obtain the full grace of the Lord.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)