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श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 26: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 2: गीता का सार  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  6.26.58 
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५८ ॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को अपने खोल में समेट लेता है, उसी प्रकार जो मनुष्य अपनी इन्द्रियों को इन्द्रिय-विषयों से हटा लेता है, वह पूर्ण चेतना में दृढ़तापूर्वक स्थित हो जाता है।
 
Just as a tortoise withdraws its limbs into its shell, a man who withdraws his senses from the sense-objects becomes firmly established in perfect consciousness.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)