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mahabharat 6.26.51: इस प्रकार, भगवान की भक्ति में लीन रहकर, महान ऋषि, मुनि या भक्त इस भौतिक संसार में कर्मों के फल से मुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार, वे जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं और भगवान के पास जाकर उस अवस्था को प्राप्त करते हैं जो सभी कष्टों से परे है।   |   mahabharat अध्याय 6.26: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 2: गीता का सार   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 26: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 2: गीता का सार  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  6.26.51 
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥ ५१ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार, भगवान की भक्ति में लीन रहकर, महान ऋषि, मुनि या भक्त इस भौतिक संसार में कर्मों के फल से मुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार, वे जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं और भगवान के पास जाकर उस अवस्था को प्राप्त करते हैं जो सभी कष्टों से परे है।
 
In this way, by remaining engaged in devotion to the Lord, great sages, munis or devotees free themselves from the results of karma in this material world. In this way, they are freed from the cycle of birth and death and by going to the Lord, they attain that state which is beyond all suffering.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)