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श्लोक 6.26.48  |
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ ४८ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे अर्जुन! जय-पराजय की सारी आसक्ति त्यागकर समभाव से अपने कर्म करो। ऐसी समता को योग कहते हैं। |
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| O Arjuna! Give up all attachment to victory or defeat and perform your duties with equanimity. Such equanimity is called yoga. |
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