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श्लोक 6.26.40  |
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ ४० ॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रयास में न तो हानि है और न ही हानि, अपितु इस मार्ग पर थोड़ी सी भी प्रगति महान भय से रक्षा कर सकती है। |
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| There is neither loss nor loss in this effort but even a little progress on this path can protect one from great fear. |
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