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mahabharat 6.25.44: ओह! यह कितने आश्चर्य की बात है कि हम सब जघन्य पाप करने को तत्पर हो रहे हैं। राज्य के सुख भोगने की लालसा में हम अपने ही सगे-संबंधियों की हत्या करने पर तुले हुए हैं।   |   mahabharat अध्याय 6.25: श्रीमद्भगवद्‍गीता अध्याय 1: युद्धस्थल परीक्षण एवं अर्जुन विषाद योग   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.25.44 
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
ओह! यह कितने आश्चर्य की बात है कि हम सब जघन्य पाप करने को तत्पर हो रहे हैं। राज्य के सुख भोगने की लालसा में हम अपने ही सगे-संबंधियों की हत्या करने पर तुले हुए हैं।
 
Oh! How surprising it is that we are all getting ready to commit heinous sins. Driven by the desire to enjoy the pleasures of the kingdom, we are bent on killing our own relatives.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)