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यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ ३७ ॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मन्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ ३८ ॥
अनुवाद
हे जनार्दन! यद्यपि लोभ से भरे हुए मन वाले ये लोग अपने कुटुम्बियों को मारने या अपने मित्रों के साथ विश्वासघात करने में कोई हानि नहीं देखते, फिर भी हम लोग, जो अपने ही कुटुम्ब को नष्ट करने में पाप देखते हैं, ऐसे पापकर्म में क्यों प्रवृत्त हों?
O Janardana! Although these people, whose minds are overwhelmed by greed, see no harm in killing their own family or betraying their friends, why should we, who can see the crime in destroying one's own family, indulge in such sinful acts?
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥