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mahabharat 6.17.5-6: कुरुवंश के वृद्ध पितामह भीष्म और भारद्वाजपुत्र द्रोणाचार्य - ये दोनों शत्रुओं का नाश करने वाले महारथी प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर अपने मन को वश में करके 'पाण्डवों की जय हो' ऐसा आशीर्वाद देते थे; किन्तु अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार वे पाण्डवों के साथ केवल तुम्हारे ही लिए युद्ध करेंगे॥ 5-6॥   |   mahabharat अध्याय 6.17: कौरवमहारथियोंका युद्धके लिये आगे बढ़ना तथा उनके व्यूह, वाहन और ध्वज आदिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 17: कौरवमहारथियोंका युद्धके लिये आगे बढ़ना तथा उनके व्यूह, वाहन और ध्वज आदिका वर्णन  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  6.17.5-6 
अहन्यहनि पार्थानां वृद्ध: कुरुपितामह:।
भरद्वाजात्मजश्चैव प्रातरुत्थाय संयतौ॥ ५॥
जयोऽस्तु पाण्डुपुत्राणामित्यूचतुररिंदमौ।
युयुधाते तवार्थाय यथा स समय: कृत:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
कुरुवंश के वृद्ध पितामह भीष्म और भारद्वाजपुत्र द्रोणाचार्य - ये दोनों शत्रुओं का नाश करने वाले महारथी प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर अपने मन को वश में करके 'पाण्डवों की जय हो' ऐसा आशीर्वाद देते थे; किन्तु अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार वे पाण्डवों के साथ केवल तुम्हारे ही लिए युद्ध करेंगे॥ 5-6॥
 
The aged grandfather of the Kuru clan, Bhishma and Bharadvajan's son Dronacharya - both these great warriors, who destroyed the enemies, would get up every morning and while controlling their minds, would give the blessing, 'Victory to the Pandavas'; but according to the vow they had taken, they would fight with the Pandavas for your sake only.॥ 5-6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)