श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 14: धृतराष्ट्रका विलाप करते हुए भीष्मजीके मारे जानेकी घटनाको विस्तारपूर्वक जाननेके लिये संजयसे प्रश्न करना  »  श्लोक 55-56
 
 
श्लोक  6.14.55-56 
जीवितेऽप्यद्य सामर्थ्यं किमिवास्मासु संजय॥ ५५॥
घातयित्वा महावीर्यं पितरं लोकधार्मिकम्।
अगाधे सलिले मग्नां नावं दृष्ट्वेव पारगा:॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
संजय! आज जीवित रहते हुए भी हममें क्या बल है? अपने विश्वविख्यात, धर्मात्मा और पराक्रमी पितामह भीष्म को युद्ध में मारकर हम उसी प्रकार शोक में डूब गए हैं, जैसे समुद्र पार जाने की इच्छा रखने वाला यात्री अपनी नाव को गहरे जल में डूबते देखकर दुःखी होता है ॥ 55-56॥
 
Sanjay! What strength do we have even though we are alive today? Having killed our world-renowned, virtuous and valiant father Bhishma in battle, we have drowned in grief in the same way as a traveller who wants to cross the sea is saddened when he sees his boat sinking in the deep water. ॥ 55-56॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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