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mahabharat 6.122.6-7: उसके वचन सुनकर बलवान कुरुपुत्र भीष्म ने, जिनके नेत्र बन्द थे, धीरे से अपनी आँखें खोलीं और उस स्थान को निर्जन देखकर, रक्षकों को दूर हटा दिया और एक हाथ से कर्ण को स्नेहपूर्वक इस प्रकार हृदय से लगा लिया, जैसे पिता अपने पुत्र को हृदय से लगा लेता है। तत्पश्चात् उन्होंने इस प्रकार कहा -॥6-7॥   |   mahabharat अध्याय 6.122: भीष्म और कर्णका रहस्यमय संवाद   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 122: भीष्म और कर्णका रहस्यमय संवाद  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  6.122.6-7 
तच्छ्रुत्वा कुरुवृद्धो हि बली संवृतलोचन:।
शनैरुद्वीक्ष्य सस्नेहमिदं वचनमब्रवीत्॥ ६॥
रहितं धिष्ण्यमालोक्य समुत्सार्य च रक्षिण:।
पितेव पुत्रं गाङ्गेय: परिरभ्यैकपाणिना॥ ७॥
 
 
अनुवाद
उसके वचन सुनकर बलवान कुरुपुत्र भीष्म ने, जिनके नेत्र बन्द थे, धीरे से अपनी आँखें खोलीं और उस स्थान को निर्जन देखकर, रक्षकों को दूर हटा दिया और एक हाथ से कर्ण को स्नेहपूर्वक इस प्रकार हृदय से लगा लिया, जैसे पिता अपने पुत्र को हृदय से लगा लेता है। तत्पश्चात् उन्होंने इस प्रकार कहा -॥6-7॥
 
On hearing his words, the powerful Kuru elder Bhishma, whose eyes were closed, slowly opened his eyes and seeing that the place was deserted, he pushed the guards away and embraced Karna with one hand affectionately in the same way as a father embraces his son. Thereafter he said thus -॥ 6-7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)