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mahabharat 6.122.4-5: वीर भीष्म की आँखें बंद हो गईं। उन्हें देखकर महाबली कर्ण की आँखों में आँसू भर आए और उसने अश्रुपूर्ण वाणी में कहा - 'भीष्म! भीष्म! महाबाहो! कौरवश्रेष्ठ! मैं वही राधापुत्र कर्ण हूँ, जो सदैव आपकी दृष्टि में रहता था और जिसे आप सर्वत्र घृणा से देखते थे।' कर्ण ने उससे ऐसा कहा ॥4-5॥   |   mahabharat अध्याय 6.122: भीष्म और कर्णका रहस्यमय संवाद   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 122: भीष्म और कर्णका रहस्यमय संवाद  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  6.122.4-5 
निमीलिताक्षं तं वीरं साश्रुकण्ठस्तदा वृष:।
भीष्म भीष्म महाबाहो इत्युवाच महाद्युति:॥ ४॥
राधेयोऽहं कुरुश्रेष्ठ नित्यमक्षिगतस्तव।
द्वेष्योऽहं तव सर्वत्र इति चैनमुवाच ह॥ ५॥
 
 
अनुवाद
वीर भीष्म की आँखें बंद हो गईं। उन्हें देखकर महाबली कर्ण की आँखों में आँसू भर आए और उसने अश्रुपूर्ण वाणी में कहा - 'भीष्म! भीष्म! महाबाहो! कौरवश्रेष्ठ! मैं वही राधापुत्र कर्ण हूँ, जो सदैव आपकी दृष्टि में रहता था और जिसे आप सर्वत्र घृणा से देखते थे।' कर्ण ने उससे ऐसा कहा ॥4-5॥
 
The eyes of the brave Bhishma were shut. Seeing him, the mighty Karna's eyes welled up with tears and with a tearful voice he said, 'Bhishma! Bhishma! Mahabaho! Best of the Kurus! I am the same Radha's son Karna, who always used to be in your sight and whom you used to look at with hatred everywhere.' Karna said this to him. ॥ 4-5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)