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mahabharat 6.121.52: हे राजन! क्रोध त्यागकर कुन्तीपुत्रों से संधि कर लो। अर्जुन ने आज तक जो कुछ किया है, वह पर्याप्त है। मेरे प्राण त्यागने पर भीष्म (तुम्हारा वैर भी समाप्त हो जाएगा) तुम दोनों में प्रेमपूर्ण सम्बन्ध स्थापित हो जाएगा और जो मृत्यु से बच जाएँगे, वे सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करें। इसमें तुम्हें प्रसन्न होना चाहिए॥ 52॥   |   mahabharat अध्याय 6.121: अर्जुनका दिव्य जल प्रकट करके भीष्मजीकी प्यास बुझाना तथा भीष्मजीका अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए दुर्योधनको संधिके लिये समझाना   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 121: अर्जुनका दिव्य जल प्रकट करके भीष्मजीकी प्यास बुझाना तथा भीष्मजीका अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए दुर्योधनको संधिके लिये समझाना  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  6.121.52 
त्यक्त्वा मन्युं व्युपशाम्यस्व पार्थै:
पर्याप्तमेतद् यत् कृतं फाल्गुनेन।
भीष्मस्यान्तादस्तु व: सौहृदं च
जीवन्तु शेषा: साधु राजन् प्रसीद॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! क्रोध त्यागकर कुन्तीपुत्रों से संधि कर लो। अर्जुन ने आज तक जो कुछ किया है, वह पर्याप्त है। मेरे प्राण त्यागने पर भीष्म (तुम्हारा वैर भी समाप्त हो जाएगा) तुम दोनों में प्रेमपूर्ण सम्बन्ध स्थापित हो जाएगा और जो मृत्यु से बच जाएँगे, वे सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करें। इसमें तुम्हें प्रसन्न होना चाहिए॥ 52॥
 
‘O King! Leave your anger and make peace with the sons of Kunti. Whatever Arjun has done till date is enough. With the end of my life Bhishma, (your enmity will also end) a loving relationship will be established between you and those who are spared from death should live well. You should be happy for this.॥ 52॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)