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mahabharat 6.121.45: ‘तात! कुरुश्रेष्ठ! जब तक महाबाहु भगवान श्रीकृष्ण अपनी प्रजा के प्रेम के अधीन हैं, तब तक यदि तुम वीर अर्जुन के साथ संधि करोगे तो अच्छा रहेगा।’ 45॥   |   mahabharat अध्याय 6.121: अर्जुनका दिव्य जल प्रकट करके भीष्मजीकी प्यास बुझाना तथा भीष्मजीका अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए दुर्योधनको संधिके लिये समझाना   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 121: अर्जुनका दिव्य जल प्रकट करके भीष्मजीकी प्यास बुझाना तथा भीष्मजीका अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए दुर्योधनको संधिके लिये समझाना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  6.121.45 
यावत् कृष्णो महाबाहु: स्वाधीन: कुरुसत्तम।
तावत् पार्थेन शूरेण संधिस्ते तात युज्यताम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
‘तात! कुरुश्रेष्ठ! जब तक महाबाहु भगवान श्रीकृष्ण अपनी प्रजा के प्रेम के अधीन हैं, तब तक यदि तुम वीर अर्जुन के साथ संधि करोगे तो अच्छा रहेगा।’ 45॥
 
‘Tat! Kurushrestha! As long as the mighty-armed Lord Shri Krishna is under the love of his people, it will be fine if you have an alliance with the brave Arjuna. 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)