श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 121: अर्जुनका दिव्य जल प्रकट करके भीष्मजीकी प्यास बुझाना तथा भीष्मजीका अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए दुर्योधनको संधिके लिये समझाना  »  श्लोक 40-42
 
 
श्लोक  6.121.40-42 
एतस्य कर्ता लोकेऽस्मिन् नान्य: कश्चन विद्यते।
आग्नेयं वारुणं सौम्यं वायव्यमथ वैष्णवम्॥ ४०॥
ऐन्द्रं पाशुपतं ब्राह्मं पारमेष्ठॺं प्रजापते:।
धातुस्त्वष्टुश्च सवितुर्वैवस्वतमथापि वा॥ ४१॥
सर्वस्मिन् मानुषे लोके वेत्त्येको हि धनंजय:।
कृष्णो वा देवकीपुत्रो नान्यो वेदेह कश्चन॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में ऐसा पराक्रम करने वाला कोई दूसरा नहीं है। इस सम्पूर्ण मानवलोक में एकमात्र भगवान श्रीकृष्ण ही आग्नेय, वरुण, सौम्य, वायव्य, वैष्णव, ऐन्द्र, पाशुपत, ब्रह्म, परमेष्ठ, प्रजापत्य, धात्र, त्वष्ट्र, सवित्र और वैवस्वत आदि समस्त दिव्यास्त्रों को जानते हैं। यहाँ अन्य कोई इन अस्त्रों को नहीं जानता। 40-42॥
 
There is no one else in this world who can perform such a feat. Lord Shri Krishna, the only one in this entire human world knows all the divine weapons like Aagneya, Varun, Soumya, Vayavya, Vaishnav, Aindra, Pashupat, Brahm, Parameshtha, Prajapatya, Dhatra, Tvashtra, Savitra and Vaivaswat etc. No one else here knows these weapons. 40-42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)