श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 121: अर्जुनका दिव्य जल प्रकट करके भीष्मजीकी प्यास बुझाना तथा भीष्मजीका अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए दुर्योधनको संधिके लिये समझाना  »  श्लोक 22-24h
 
 
श्लोक  6.121.22-24h 
तत: प्रदक्षिणं कृत्वा रथेन रथिनां वर:।
शयानं भरतश्रेष्ठं सर्वशस्त्रभृतां वरम्॥ २२॥
संधाय च शरं दीप्तमभिमन्त्र्य स पाण्डव:
पर्जन्यास्त्रेण संयोज्य सर्वलोकस्य पश्यत:॥ २३॥
अविध्यत् पृथिवीं पार्थ: पार्श्वे भीष्मस्य दक्षिणे।
 
 
अनुवाद
तदनन्तर रथियों में श्रेष्ठ पाण्डुपुत्र अर्जुन ने शय्या पर शयन करते हुए समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ भीष्म के रथ की परिक्रमा करके अपने धनुष पर एक तेजस्वी बाण चढ़ाया और सब लोगों के देखते-देखते मन्त्रों का उच्चारण करते हुए उस बाण को पर्जन्यास्त्र के साथ संयोजित करके भीष्म के दाहिनी ओर पृथ्वी पर चलाया। 22-23 1/2॥
 
Then, Arjuna, the son of Pandu, the best of the charioteers, circled around the chariot of Bhishma, the best of all armed men, who was sleeping on the chariot bed, and fixed a brilliant arrow on his bow and in full view of all the people, chanting mantras, combined that arrow with the Parjanyastra and shot it on the earth on the right side of Bhishma. 22-23 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)