श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 121: अर्जुनका दिव्य जल प्रकट करके भीष्मजीकी प्यास बुझाना तथा भीष्मजीका अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए दुर्योधनको संधिके लिये समझाना  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  6.121.13-14 
उपानीतं तु पानीयं दृष्ट्वा शान्तनवोऽब्रवीत्।
नाद्यातीता मया शक्या भोगा: केचन मानुषा:॥ १३॥
अपक्रान्तो मनुष्येभ्य: शरशय्यां गतो ह्यहम्।
प्रतीक्षमाणस्तिष्ठामि निवृत्तिं शशिसूर्ययो:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
उनके द्वारा लाया हुआ जल देखकर शान्तनु नन्दन भीष्म बोले - 'अब मैं मनुष्यलोक के किसी भी सुख का उपयोग नहीं कर सकता, मैंने उनका त्याग कर दिया है। यद्यपि मैं यहाँ बाणों की शय्या पर सो रहा हूँ, तथापि मैं मनुष्यलोक से ऊपर उठ गया हूँ। मैं यहाँ केवल सूर्य और चन्द्रमा के उत्तरायण पथ पर आने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।'॥13-14॥
 
Seeing the water brought by them, Shantanu Nandan Bhishma said – ‘Now I cannot use any of the pleasures of the human world, I have abandoned them. Although I am sleeping here on the bed of arrows, yet I have risen above the human world. I am only waiting here for the Sun and Moon to come on the northern path.'॥ 13-14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)