श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 120: भीष्मजीकी महत्ता तथा अर्जुनके द्वारा भीष्मको तकिया देना एवं उभय पक्षकी सेनाओंका अपने शिबिरमें जाना और श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर-संवाद  »  श्लोक 61-64
 
 
श्लोक  6.120.61-64 
उपधानं ततो दत्त्वा पितुस्ते मनुजेश्वरा:॥ ६१॥
सहिता: पाण्डवा: सर्वे कुरवश्च महारथा:।
उपगम्य महात्मानं शयानं शयने शुभे॥ ६२॥
तेऽभिवाद्य ततो भीष्मं कृत्वा च त्रि:प्रदक्षिणम्।
विधाय रक्षां भीष्मस्य सर्व एव समन्तत:॥ ६३॥
वीरा: स्वशिबिराण्येव ध्यायन्त: परमातुरा:।
निवेशायाभ्युपागच्छन् सायाह्ने रुधिरोक्षिता:॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
राजन! अपने पिता के समान भीष्म को उपर्युक्त तकिया देकर वे सभी राजा, पाण्डव तथा पराक्रमी कौरव योद्धा एक साथ बाणों की सुन्दर शय्या पर शयन कर रहे महाबली भीष्म के पास गए, उन्हें प्रणाम किया, उनकी तीन बार परिक्रमा की तथा सब ओर से भीष्म की रक्षा का प्रबन्ध करके सभी वीर योद्धा अपने शिविर की ओर चले गए। वे बड़ी चिन्ता में भीष्म का स्मरण कर रहे थे। सायंकाल के समय रक्त से लथपथ होकर वे सभी अपने धाम को चले गए।
 
King! After giving the above-mentioned pillow to Bhishma, who was like your father, all those kings, Pandavas and the mighty Kaurava warriors together went to the great Bhishma who was sleeping on a beautiful bed of arrows, bowed to him and circumambulated him thrice and after making arrangements for Bhishma's protection from all sides, all the brave warriors left for their camp. They were thinking of Bhishma in great anxiety. In the evening, soaked in blood, all of them went to their abode.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)