श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 120: भीष्मजीकी महत्ता तथा अर्जुनके द्वारा भीष्मको तकिया देना एवं उभय पक्षकी सेनाओंका अपने शिबिरमें जाना और श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर-संवाद  »  श्लोक 42-43h
 
 
श्लोक  6.120.42-43h 
शयनस्यानुरूपं वै शीघ्रं वीर प्रयच्छ मे।
त्वं हि पार्थ समर्थो वै श्रेष्ठ: सर्वधनुष्मताम्॥ ४२॥
क्षत्रधर्मस्य वेत्ता च बुद्धिसत्त्वगुणान्वित:।
 
 
अनुवाद
वीर कुन्तीकुमार! इस शय्या के समान तकिया मुझे शीघ्र दे दीजिए। इसे देने में केवल आप ही समर्थ हैं; क्योंकि समस्त धनुर्धरों में आपका स्थान बहुत ऊँचा है। आप क्षत्रियधर्म के ज्ञाता हैं तथा बुद्धि और सत्व आदि गुणों से युक्त हैं।॥42 1/2॥
 
Valiant Kuntikumar! Give me a pillow to match this bed quickly. Only you are capable of giving it; because you have a very high position among all the archers. You are a knower of Kshatriyadharma and are endowed with virtues like wisdom and goodness.'॥ 42 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)