श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 12: कुश, क्रौंच और पुष्कर आदि द्वीपोंका तथा राहु, सूर्य एवं चन्द्रमाके प्रमाणका वर्णन  »  श्लोक 44-45
 
 
श्लोक  6.12.44-45 
सूर्यस्त्वष्टौ सहस्राणि द्वे चान्ये कुरुनन्दन।
विष्कम्भेण ततो राजन् मण्डलं त्रिंशता समम्॥ ४४॥
अष्टपञ्चाशतं राजन् विपुलत्वेन चानघ।
श्रूयते परमोदार: पतगोऽसौ विभावसु:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
कुरुनन्दन! सूर्य का व्यास विस्तार दस हजार योजन है, उसकी परिधि का विस्तार तीस हजार योजन है और उसकी व्यापकता अट्ठावन सौ योजन है। ऊँघ! इस प्रकार तीव्रगति वाले, परम उदार भगवान सूर्य के त्रिविध विस्तार का वर्णन सुना जाता है। 44-45॥
 
Kurunandan! The diametrical expansion of the Sun is ten thousand yojanas and the expansion of its circumference or circle is thirty thousand yojanas and its abundance is fifty-eight hundred yojanas. Ungh! In this way the description of the three-fold expansion of the fast-moving, most generous Lord Surya is heard. 44-45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)