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mahabharat 6.12.34-35h: महाराज! इनमें से सुप्रतीक नामक हाथी का आकार और मात्रा कितनी है, यह मैं नहीं बता सकता, जिसके माथे से मदिरा की धारा बहती रहती है। वह ऊपर-नीचे चारों ओर फैली हुई है। वह असीम है।   |   mahabharat अध्याय 6.12: कुश, क्रौंच और पुष्कर आदि द्वीपोंका तथा राहु, सूर्य एवं चन्द्रमाके प्रमाणका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 12: कुश, क्रौंच और पुष्कर आदि द्वीपोंका तथा राहु, सूर्य एवं चन्द्रमाके प्रमाणका वर्णन  »  श्लोक 34-35h
 
 
श्लोक  6.12.34-35h 
सुप्रतीकस्तथा राजन् प्रभिन्नकरटामुख:।
तस्याहं परिमाणं तु न संख्यातुमिहोत्सहे॥ ३४॥
असंख्यात: स नित्यं हि तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा।
 
 
अनुवाद
महाराज! इनमें से सुप्रतीक नामक हाथी का आकार और मात्रा कितनी है, यह मैं नहीं बता सकता, जिसके माथे से मदिरा की धारा बहती रहती है। वह ऊपर-नीचे चारों ओर फैली हुई है। वह असीम है।
 
King! Among these, I cannot tell what is the size and quantity of the elephant named Suprateek, from whose forehead a stream of wine keeps flowing. It is spread all around, above and below. It is limitless. 34 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)