श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 12: कुश, क्रौंच और पुष्कर आदि द्वीपोंका तथा राहु, सूर्य एवं चन्द्रमाके प्रमाणका वर्णन  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  6.12.14-15 
सप्तमं कापिलं वर्षं सप्तैते वर्षलम्भका:।
एतेषु देवगन्धर्वा: प्रजाश्च जगतीश्वर॥ १४॥
विहरन्ते रमन्ते च न तेषु म्रियते जन:।
न तेषु दस्यव: सन्ति म्लेच्छजात्योऽपि वा नृप॥ १५॥
 
 
अनुवाद
सातवाँ वर्ष कपिल नाम से है। ये सात वर्ष समुदाय के हैं। हे पृथ्वी! इनमें देवता, गन्धर्व और मनुष्य सुखपूर्वक रहते हैं। इनमें से किसी की मृत्यु नहीं होती। हे मनुष्यों के स्वामी! वहाँ न तो डाकू होते हैं और न ही म्लेच्छ जाति के लोग॥14-15॥
 
The seventh year is called Kapil. These are the seven years of the community. O Earth! In all these, the gods, Gandharvas and humans live happily. None of them die. O Lord of men! There are no robbers or people of the mlechha caste there.॥ 14-15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)