श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 119: कौरवपक्षके प्रमुख महारथियोंद्वारा सुरक्षित होनेपर भी अर्जुनका भीष्मको रथसे गिराना, शरशय्यापर स्थित भीष्मके समीप हंसरूपधारी ऋषियोंका आगमन एवं उनके कथनसे भीष्मका उत्तरायणकी प्रतीक्षा करते हुए प्राण धारण करना  »  श्लोक 59-61h
 
 
श्लोक  6.119.59-61h 
ततो दु:शासनं भूय: स्मयमान इवाब्रवीत्॥ ५९॥
अतिविद्ध: शितैर्बाणैर्भृशं गाण्डीवधन्वना।
वज्राशनिसमस्पर्शा अर्जुनेन शरा युधि॥ ६०॥
मुक्ता: सर्वेऽव्यवच्छिन्ना नेमे बाणा: शिखण्डिन:।
 
 
अनुवाद
तब उन्होंने पुनः मुस्कुराते हुए दु:शासन से कहा, "गाण्डीवधारी अर्जुन ने युद्धभूमि में ऐसे बाण छोड़े हैं, जिनका स्पर्श वज्र और बिजली के समान असह्य है। उनके तीखे बाणों से मैं बुरी तरह घायल हो गया हूँ। ये सभी बाण जो लगातार छूट रहे हैं, शिखण्डी के नहीं हो सकते।"
 
Then he again smilingly said to Dushasan, 'Arjuna, the bearer of Gandiva, has shot such arrows in the battlefield, whose touch is as intolerable as thunderbolt and lightning. I have been severely injured by his sharp arrows. All these arrows which are being shot in a continuous manner cannot be Shikhandi's.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)