श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 119: कौरवपक्षके प्रमुख महारथियोंद्वारा सुरक्षित होनेपर भी अर्जुनका भीष्मको रथसे गिराना, शरशय्यापर स्थित भीष्मके समीप हंसरूपधारी ऋषियोंका आगमन एवं उनके कथनसे भीष्मका उत्तरायणकी प्रतीक्षा करते हुए प्राण धारण करना  »  श्लोक 34-35
 
 
श्लोक  6.119.34-35 
पित्रा तुष्टेन मे पूर्वं यदा कालीमुदावहम्॥ ३४॥
स्वच्छन्दमरणं दत्तमवध्यत्वं रणे तथा।
तस्मान्मृत्युमहं मन्ये प्राप्तकालमिवात्मन:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
‘पूर्वकाल में जब मैंने माता सत्यवती का विवाह अपने पिता के साथ किया था, तब मेरे पिता ने प्रसन्न होकर मुझे दो वर दिए थे – ‘तुम जब चाहोगे तभी मरोगे और युद्ध में तुम्हें कोई नहीं मार सकेगा।’ ऐसी स्थिति में मुझे स्वेच्छा से मृत्यु स्वीकार कर लेनी चाहिए। मैं समझता हूँ कि अब वह समय आ गया है।’॥34-35॥
 
‘In the past, when I got mother Satyavati married to my father, my father was pleased and gave me two boons – ‘You will die only when you wish to and no one will be able to kill you in battle.’ In such a situation, I should accept death willingly. I think that the time has come now.’॥ 34-35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)