भरतानां च ये पूर्वे ते चैनं प्रशशंसिरे।
महोपनिषदं चैव योगमास्थाय वीर्यवान्॥ १२१॥
जपञ्शान्तनवो धीमान् कालाकाङ्क्षी स्थितोऽभवत्॥ १२२॥
अनुवाद
भरतवंश के पूर्वजों ने भी भीष्मजी की बहुत प्रशंसा की। परम पराक्रमी और बुद्धिमान शान्तनुनन्दन भीष्म महान उपनिषदों के योगतत्त्व का आश्रय लेकर उत्तरायण काल की प्रतीक्षा करते हुए प्रणव का जप करते हुए बाँस की शय्या पर शयन करते रहे। 121-122॥
The ancestors of Bharatvansh also praised Bhishmaji a lot. The most valiant and intelligent Shantanunandan Bhishma, taking refuge in the essence of yoga of the great Upanishads, remained sleeping on the bamboo bed while chanting Pranava, waiting for the Uttarayan period. 121-122॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मनिपातने एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ ११९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्मजीके रथसे गिरनेसे सम्बन्ध रखनेवाला
एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११९॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल १२५ श्लोक हैं।]
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥