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mahabharat 6.119.107-108: अतः उत्तरायण में मरने की इच्छा से मैं अपने प्राण धारण करूँगा। मेरे पितामह ने मुझे जो वरदान दिया है कि मैं जब चाहूँ, तभी मरूँगा, वह वरदान पूर्ण हो। जब तक मेरे प्राण त्यागने का नियत समय न आ जाए, तब तक मैं अवश्य ही अपने प्राण धारण करूँगा।॥107-108॥   |   mahabharat अध्याय 6.119: कौरवपक्षके प्रमुख महारथियोंद्वारा सुरक्षित होनेपर भी अर्जुनका भीष्मको रथसे गिराना, शरशय्यापर स्थित भीष्मके समीप हंसरूपधारी ऋषियोंका आगमन एवं उनके कथनसे भीष्मका उत्तरायणकी प्रतीक्षा करते हुए प्राण धारण करना   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 119: कौरवपक्षके प्रमुख महारथियोंद्वारा सुरक्षित होनेपर भी अर्जुनका भीष्मको रथसे गिराना, शरशय्यापर स्थित भीष्मके समीप हंसरूपधारी ऋषियोंका आगमन एवं उनके कथनसे भीष्मका उत्तरायणकी प्रतीक्षा करते हुए प्राण धारण करना  »  श्लोक 107-108
 
 
श्लोक  6.119.107-108 
तस्मात् प्राणान् धारयिष्ये मुमूर्षुरुदगायने।
यश्च दत्तो वरो मह्यं पित्रा तेन महात्मना॥ १०७॥
छन्दतो मृत्युरित्येवं तस्य चास्तु वरस्तथा।
धारयिष्ये तत: प्राणानुत्सर्गे नियते सति॥ १०८॥
 
 
अनुवाद
अतः उत्तरायण में मरने की इच्छा से मैं अपने प्राण धारण करूँगा। मेरे पितामह ने मुझे जो वरदान दिया है कि मैं जब चाहूँ, तभी मरूँगा, वह वरदान पूर्ण हो। जब तक मेरे प्राण त्यागने का नियत समय न आ जाए, तब तक मैं अवश्य ही अपने प्राण धारण करूँगा।॥107-108॥
 
‘Therefore, with the desire to die in Uttarayan, I will hold on to my life. The boon given to me by my great father that I will die only when I wish to, may that boon come true. I will certainly hold on to my life until the appointed time of giving up my life arrives.'॥107-108॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)