श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 114: कौरवपक्षके प्रमुख महारथियोंके साथ युद्धमें भीमसेन और अर्जुनका अद्भुत पुरुषार्थ  » 
 
 
अध्याय 114: कौरवपक्षके प्रमुख महारथियोंके साथ युद्धमें भीमसेन और अर्जुनका अद्भुत पुरुषार्थ
 
श्लोक 1:  संजय कहते हैं - हे राजन! उस समय अर्जुन ने युद्धभूमि पर विजय पाने के लिए प्रयत्नशील महारथी शल्य को मुड़े हुए बाणों की वर्षा से आच्छादित कर दिया।
 
श्लोक 2-4h:  तत्पश्चात् सुशर्मा और कृपाचार्य को भी तीन-तीन बाणों से बींध डाला। राजेन्द्र! तत्पश्चात् युद्ध में प्राग्ज्योतिषी राजा भगदत्त, सिन्धुराज जयद्रथ, चित्रसेन, विकर्ण, कृतवर्मा, दुर्मर्षण तथा महारथियों विन्द और अनुविन्द ने गीध पंख युक्त तीन-तीन बाणों द्वारा उन सबको विशेष पीड़ा पहुँचाई। 2-3 1/2॥
 
श्लोक 4-5:  तत्पश्चात् महारथी अर्जुन ने अपने बाणों से आपकी सेना को अत्यन्त पीड़ा पहुँचाई। हे भारत! चित्रसेन के रथ पर बैठे हुए जयद्रथ ने युद्धस्थल में कुन्तीपुत्र अर्जुन को घायल कर दिया तथा भीमसेन को भी अनेक बाणों से घायल कर दिया।
 
श्लोक 6:  महाराज! तत्पश्चात् युद्धस्थल में श्रेष्ठ रथी कृपाचार्य और शल्य ने भी अर्जुन को बार-बार बाणों से घायल कर दिया, जो उसके प्राणों को छेदते थे।
 
श्लोक 7-8h:  हे प्रजानाथ! आपके चित्रसेन आदि पुत्रों ने भी युद्धभूमि में अर्जुन और भीमसेन को पाँच-पाँच तीखे बाणों से तत्काल घायल कर दिया।
 
श्लोक 8-9h:  उस समय श्रेष्ठ रथी कुन्तीपुत्र भीमसेन और अर्जुन ने युद्धभूमि में विशाल त्रिगर्त सेना को त्रास दिया।
 
श्लोक 9-10h:  इधर सुशर्मा ने भी युद्धभूमि में जोर से गर्जना करते हुए नौ तीव्र बाणों से अर्जुन को घायल कर दिया और विशाल पाण्डव सेना को भयभीत कर दिया।
 
श्लोक 10-11h:  इसी प्रकार अन्य वीर योद्धाओं ने भीमसेन और अर्जुन को स्वर्ण पंख वाले तीखे बाणों से घायल कर दिया।
 
श्लोक 11-12h:  उन सब रथियों के बीच में खड़े होकर क्रीड़ा करते हुए, भरत के आभूषणों से सुसज्जित, दानशील महारथी, कुन्तीपुत्र भीमसेन और अर्जुन विचित्र लग रहे थे।
 
श्लोक 12:  जैसे मांस की लालसा से मदमस्त दो सिंह गौओं के समूह के बीच खड़े थे, उसी प्रकार भीमसेन और अर्जुन उस युद्धस्थल में शोभायमान हो रहे थे॥12॥
 
श्लोक 13:  युद्धभूमि में उन दोनों वीरों ने सैकड़ों वीर योद्धाओं के धनुष-बाण बार-बार तोड़ डाले तथा उनके सिर भी काट डाले।
 
श्लोक 14:  उस महायुद्ध में बहुत से रथ नष्ट हो गए, सैकड़ों घोड़े मारे गए और बहुत से हाथी तथा हाथी सवार नष्ट हो गए ॥14॥
 
श्लोक 15:  महाराज! बहुत से रथी और घुड़सवार इधर-उधर मारे जाने के कारण काँपते और पीड़ा से छटपटाते दिखाई दे रहे थे।
 
श्लोक 16:  वहाँ पृथ्वी मृत हाथियों, पैदल सैनिकों, घोड़ों और अनेक टूटे हुए रथों से ढकी हुई थी।
 
श्लोक d1h-d2h:  भारत! वहाँ की भूमि गिरे हुए छत्रों, झण्डों, पंखों से सजे हुए स्वर्ण दण्डों, फेंके हुए अंकुशों, कोड़ों, घंटियों और झूलों के अनेक टुकड़ों से ढकी हुई थी।
 
श्लोक d3h-18:  वहाँ की भूमि भी केयूर, अंगद, हार और जड़ाऊ कुण्डलों, रंकु मृग की कोमल खाल, वीरों की पगड़ियाँ, ऋष्टि आदि आयुधों तथा चामर और व्याजन आदि से आच्छादित थी ॥18॥
 
श्लोक 19:  युद्धभूमि में जगह-जगह गिरे हुए राजाओं की चंदन-रंगे भुजाओं और जांघों से पटी हुई थी।
 
श्लोक 20:  महाराज! मैंने उस युद्धस्थल में अर्जुन का अद्भुत पराक्रम देखा कि उस महाबली योद्धा ने अपने बाणों से शत्रु पक्ष के सभी प्रमुख योद्धाओं को रोक दिया तथा उनमें से बहुतों को मार डाला।
 
श्लोक 21:  भीमसेन और अर्जुन का पराक्रम देखकर आपका पराक्रमी पुत्र दुर्योधन स्वयं गंगापुत्र भीष्म के रथ के पास पहुँचा।
 
श्लोक 22:  उस समय कृपाचार्य, कृतवर्मा, सिंधुराज जयद्रथ तथा अवंती के विन्द और अनुविन्द ने भी युद्ध नहीं छोड़ा। 22॥
 
श्लोक 23:  तत्पश्चात् महाधनुर्धर भीमसेन और महारथी अर्जुन युद्धस्थल में कौरवों की उस भयंकर सेना को पीछे हटाने लगे॥23॥
 
श्लोक 24:  तब बहुत से भूमिपाल मिलकर तुरंत ही अर्जुन के रथ पर मोरपंखों से युक्त बहुत से अयुत और अबुद्ध बाणों की वर्षा करने लगे॥24॥
 
श्लोक 25:  तब अर्जुन ने सब ओर बाणों का जाल बिछाकर पृथ्वी के रक्षक उन महारथियों को रोक दिया और उन्हें तुरन्त ही मृत्युलोक में भेज दिया॥25॥
 
श्लोक 26:  तब महारथी शल्य ने क्रोध में आकर मानो खेल खेल में ही युद्ध भूमि में अपने मुड़े हुए भालों से अर्जुन की छाती पर गहरा घाव कर दिया।
 
श्लोक 27:  यह देखकर अर्जुन ने पाँच बाणों से उसके धनुष और दस्तानों को काट डाला और अपने तीखे भालों से उसके नासिकास्थानों पर गहरा घाव कर दिया॥ 27॥
 
श्लोक 28-29:  महाराज! तब मद्रराज ने भी भारी भार वहन करने में समर्थ दूसरा धनुष लेकर युद्धभूमि में क्रोधित होकर अर्जुन पर तीन बाणों से आक्रमण किया। वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण को पाँच बाणों से घायल करके उन्होंने भीमसेन की भुजाओं और वक्षस्थल में नौ बाण मारे।
 
श्लोक 30-31:  हे राजन! तत्पश्चात् दुर्योधन की आज्ञा पाकर द्रोणाचार्य तथा महारथी मगधराज उसी स्थान पर आये, जहाँ अर्जुन और पाण्डुपुत्र भीमसेन दुर्योधन की विशाल सेना का संहार कर रहे थे।
 
श्लोक 32:  भरतश्रेष्ठ! मगधराज जयत्सेन ने युद्धस्थल में भयंकर अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित भीमसेन को आठ तीखे बाणों से घायल कर दिया॥32॥
 
श्लोक 33:  भीमसेन ने जयत्सेन को दस बाणों से घायल कर दिया और फिर पाँच बाणों से उसे घायल कर दिया। उन्होंने उसके सारथि पर भी भाला मारा, जिससे वह रथ के आसन से गिर पड़ा।
 
श्लोक 34:  तब उसके भयभीत घोड़े सभी दिशाओं में भागने लगे और इस प्रकार मगध के राजा को पूरी सेना के सामने युद्ध के मैदान से भगा दिया गया।
 
श्लोक 35:  इसी समय अवसर पाकर द्रोणाचार्य ने भीमसेन को लोहे के बने पैंसठ तीखे बाणों से घायल कर दिया।
 
श्लोक 36:  तत्पश्चात् युद्धभूमि में युद्ध के प्रतापी भीमसेन ने पिता के समान पूजनीय गुरु द्रोणाचार्य को पैंसठ बाणों से घायल कर दिया।
 
श्लोक 37:  यहाँ अर्जुन ने लोहे के बने अनेक बाणों से सुशर्मा को घायल कर दिया और उसकी सेना को उसी प्रकार नष्ट कर दिया, जैसे वायु विशाल बादलों को छिन्न-भिन्न कर देती है।
 
श्लोक 38:  तब भीष्म, राजा दुर्योधन और कोसल के राजा बृहद्बल अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने भीमसेन और अर्जुन पर हमला कर दिया।
 
श्लोक 39:  इसी प्रकार वीर पाण्डवों और द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न ने युद्धस्थल में मुँह खोले हुए यमराज के समान दिखने वाले भीष्म पर आक्रमण किया॥39॥
 
श्लोक 40:  शिखण्डी ने भरतवंशी पितामह भीष्म के पास पहुँचकर महारथी भीष्म के संभावित भय को त्यागकर बड़ी प्रसन्नता से उन पर आक्रमण किया॥40॥
 
श्लोक 41:  युधिष्ठिर और कुन्तीपुत्रों ने शिखण्डी को युद्धभूमि में आगे खड़ा किया और समस्त प्राणियों सहित भीष्म से युद्ध करने लगे॥41॥
 
श्लोक 42:  इसी प्रकार आपके समस्त योद्धा ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाले भीष्म को युद्ध में आगे रखकर शिखण्डी आदि महारथियों तथा पाण्डवों का सामना करने लगे॥42॥
 
श्लोक 43:  तत्पश्चात् भीष्म को परास्त करने के उद्देश्य से कौरवों और पाण्डवों में भयंकर युद्ध प्रारम्भ हो गया।
 
श्लोक 44:  हे प्रजानाथ! उस युद्ध-क्रीड़ा में आपके पुत्रों की ओर से भीष्म को विजय के लिए दांव पर लगाया गया था। इस प्रकार वहाँ जय-पराजय के लिए युद्ध-क्रीड़ा खेली गई थी ॥ 44॥
 
श्लोक 45:  राजन! उस समय धृष्टद्युम्न ने अपनी सम्पूर्ण सेना को प्रेरित करते हुए कहा- 'श्रेष्ठ महारथियों! गंगापुत्र भीष्म पर आक्रमण करो। उनसे तनिक भी मत डरो।'
 
श्लोक 46:  सेनापति के ये वचन सुनकर पाण्डवों की विशाल सेना प्राणों की आसक्ति त्यागकर उस महासमर में तुरन्त ही भीष्म की ओर बढ़ी।
 
श्लोक 47:  महाराज! महारथियों में श्रेष्ठ भीष्म ने भी युद्ध के लिए अपनी ओर आती हुई उस विशाल सेना को उसी प्रकार ग्रहण किया, जैसे समुद्र तट को ग्रहण कर लेता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)