श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 108: दसवें दिन उभयपक्षकी सेनाका रणके लिये प्रस्थान तथा भीष्म और शिखण्डीका समागम एवं अर्जुनका शिखण्डीको भीष्मका वध करनेके लिये उत्साहित करना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  6.108.35 
शक्राशनिसमस्पर्शान् विमुञ्चन् निशिताञ्छरान्।
दिक्ष्वदृश्यत सर्वासु घोरं संधारयन् वपु:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
भीष्म तीखे बाणों की वर्षा कर रहे थे जिनका स्पर्श इन्द्र के वज्र के समान असह्य था और वे सब दिशाओं में भयानक रूप में दिखाई दे रहे थे ॥35॥
 
Bhishma was showering sharp arrows whose touch was as unbearable as Indra's thunderbolt and was seen in all directions in a terrifying form. ॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)